Gita Acharan

237. कर्म के मूल कारण

August 16, 2026·4 min
Episode Description from the Publisher

श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि कर्मों का पूर्णतः त्याग करना असम्भव है बल्कि त्यागी अपने कर्मों के फलों का त्याग करता है (18.11)। वे कर्म का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए कहते हैं “अधिष्ठान (कर्म का स्थान), कर्ता (कर्म करने वाला), विविध साधन (उपकरण), विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ तथा दैवम् (ईश्वरीय तत्व), ये सभी कर्मों की सिद्धि के पाँच कारण हैं। मनुष्य शरीर, मन या वाणी से जो भी कर्म करता है, चाहे वह उचित हो या अनुचित, इनपाँच कारणों से ही वह संपन्न होता है। परंतु जो अल्पबुद्धि है और जिसकी समझ सीमित है, वह स्वयं को ही ‘कर्ता’ मानता है; वह अपनी अशुद्ध बुद्धि के कारण सत्य को नहीं देख पाता” (18.13 से 18.16)।यहाँ अधिष्ठान का अर्थ हमारे मानव शरीर से है क्योंकि शरीर के बिना कोई कर्म किया ही नहीं जा सकता। जहाँ तक कर्ता का प्रश्न है, कई अवसरों पर यह स्पष्ट किया गया है कि वास्तव में तीन गुण ही सभी कर्मों के वास्तविक कर्ता हैं। साधन का स्वरूप और प्रकार समय के साथ बदलते रहते हैं जैसे कि कार, विमान आदि का आविष्कार। अस्तित्व इन साधनों का उपयोग करते हुए विविध प्रकार की गतिविधियों को प्रकट करता है।दैवम् या दैवी शक्ति का प्रभाव कर्म का पाँचवाँ कारण है। यह निस्संदेह एक रहस्यमय कारण है जो हमारी इन्द्रियों की समझ से परे है। दैवम् ही वह कारण है जिसके चलते समान परिस्थितियों में किए गए कर्म भी भिन्न-भिन्न परिणाम देते हैं जिससे हमारे भीतर भ्रम उत्पन्न होता है। श्रीकृष्ण कहते हैं “जो कर्तापन के अहंकार (अहं कृतः) से मुक्त है और जिसकी बुद्धि निर्मल है, वह इन लोगों को मारकर भी वास्तव में किसी को नहीं मारता” (18.17)। इससे पहले भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को द्वन्द्वों के बीच समान भाव रखते हुए युद्ध करने के लिए कहा था (2.38)। यद्यपि ये श्लोक प्रारम्भिक साधक को कुछ असहज प्रतीत हो सकते हैं किंतु इनका चिंतन हमें गहन आत्मबोध की दिशा में ले जाता है।यह एक अस्तित्वगत सत्य है कि हर जन्म का अंत मृत्यु होती है। जहाँ जन्म का स्वागत किया जाता है वहीं मृत्यु को तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता है, विशेषकर जब मृत्यु का स्वरूप या कारण पीड़ादायक हो। इन श्लोकों का संदेश हमें जीवन और मृत्यु के द्वैत से परे जाने के लिए प्रेरित करता है। इन्हें हम उस आधारभूत शिक्षा के रूप में भी देख सकते हैं जो हमें कर्ता से साक्षी की अवस्था की ओर रूपांतरित होने में सहायता करती है।

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