
श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में प्रकृति के तीन गुणों -सत्त्व, रजस् और तमस्, का विभिन्न प्रसंगों में विस्तार से वर्णन किया है। वे कहते हैं कि पृथ्वी पर या इस भौतिक जगत् के उच्चतर लोकों में कोई भी जीव ऐसा नहीं है जो इन तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो (18.40)। इसका अर्थ यह है कि किसी भी समय हम किसी न किसी गुण के प्रभाव में रहते हैं।श्रीकृष्ण कहते हैं सभी परिस्थितियों में कर्म गुणों द्वारा ही संपन्न होते हैं; परंतु जो व्यक्ति अहंकार से मोहित होता है, वह सोचता है -‘मैं कर्ता हूँ’ (3.27-3.29)। जो ज्ञानी इस सत्य को समझते हैं, वे आसक्त नहीं होते। गुणों में हमेंसम्मोहित कर देने की सूक्ष्म शक्ति होती है और उनके प्रभाव में हम गुणों के कार्यों से ही आसक्त हो जाते हैं। सत्रहवें और अठारहवें अध्यायों मेंगुणों के अनेक कार्यों -जैसे उपासना, आहार, यज्ञ, तप (शरीर, वाणी और मन का), दान, ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति (दृढ़ता) और सुख -का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।श्रीकृष्ण आगे का मार्ग बताते हुए हमें प्रेरित करते हैं कि हम इन तीनों गुणों से ऊपर उठकर गुणातीत बनें -जो सुख और दुःख में समान रहते हैं, आत्मस्थित होते हैं, सुखद और दुःखद परिस्थितियों में एकरस बने रहते हैं, निंदा और स्तुति दोनों को समभाव से स्वीकार करते हैं, सम्मान और अपमान में समान रहते हैं, मित्र और शत्रु दोनों के प्रति समान दृष्टि रखते हैं, और ‘मैं कर्ता हूँ’ -इस मोह का पूर्ण परित्याग कर देते हैं (14.24-14.25)।जबकि कर्ता का स्वभाव उस समय प्रभावी गुण (सत्त्व, रजस् और तमस्) पर निर्भर करता है, श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि गुणातीत वह है जो कर्तापन के मोह को ही त्याग देता है। इसी तरह सुख का भी स्वरूप गुणों के अनुसार बदलता रहता है परंतु गुणातीत व्यक्ति के लिए न किसी विशेष सुख की लालसा होती है और न ही किसी दुःख से विरोध। संक्षेप में, यहसमझना है कि जीवन गुणों के पारस्परिक प्रभाव का एक खेल है।
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