
कर्म और कर्ता के त्रिविध स्वरूप का वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण बताते हैं कि बुद्धि और धृति (धैर्य या साहस) भी गुणों के अनुसार त्रिविध हैं (18.29)। वे कहते हैं “जो बुद्धि यह जानती है कि सकाम कर्म और त्याग क्या है, क्या कर्तव्य है और क्या नहीं, क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, क्या भय है और क्या अभय, क्या बन्धन है और क्या मोक्ष -वह सात्त्विक कही जाती है (18.30)। जो बुद्धि धर्म और अधर्म में, कर्तव्य और अकर्तव्य में भ्रमित रहती है और उनमें भेद नहीं कर पाती -वह राजसिक कही जाती है (18.31)। जो बुद्धि अंधकार से आच्छादित होकर अधर्म को ही धर्म समझती है और सभी वस्तुओं को विपरीत रूप में देखती है -वह तामसिक कही जाती है” (18.32)।सामान्यतः हम यह मानते हैं कि बुद्धि व्यक्ति-विशेष के अनुसार भिन्न होती है या एक ही व्यक्ति में भी समय-समय पर बदलती रहती है। परंतु इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि हमारी बुद्धि उस समय के प्रबल गुण के प्रभाव में कार्य करती है। सत्त्व की पहचान है -स्पष्टता और विवेक; तमस् की पहचान है -भ्रम और अज्ञान; जबकि रजस् इन दोनों के बीच डगमगाता रहता है।धृति को धैर्य या दृढ़ संकल्प कहा जाता है। यह व्यक्ति के भीतर की एक सूक्ष्म शक्ति है जो उसे निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर प्रयत्नशील बनाए रखती है। कहा गया है कि धृति ही हमें वह बनाती है जो हम हैं क्योंकि यह हमारे मार्ग पर बने रहने की दृढ़ता और निरन्तरता का प्रतीक है।धृति के विषय में श्रीकृष्ण कहते हैं “वह धृति सात्विक कहलाती है, जिससे मन, इन्द्रियों और प्राण (जीवन श्वास) को योग के द्वारा संयमित किया जाता है (18.33)। जो धृति आसक्ति और फल की इच्छा से उत्पन्न सुखों और संपत्ति से चिपकी रहती है, वह राजसिक कही गई है (18.34)। और वह धृति तामसिक कहलाती है जिसमें मनुष्य स्वप्न देखना, भय, शोक, विषाद और दम्भ (अहंकार) को नहीं छोड़ता” (18.35)।
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