Gita Acharan

239. कर्ता और कर्म के तीन प्रकार

August 20, 2026·3 min
Episode Description from the Publisher

कर्ता और कर्म को समझना जीवन के सबसे जटिल विषयों में से एक है। भगवद्गीता में इन जटिलताओं की व्याख्या कई स्थानों पर की गई है। श्रीकृष्ण चेतावनी देते हैं कि कर्म और अकर्म (निष्क्रियता) की सूक्ष्मताओं से ज्ञानीजन भी भ्रमित हो जाते हैं (4.16)। श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि सृजन में सक्षम ब्रह्मांडीय ऊर्जा का पृथक्करण (बलिदान) (भूत-भाव-उद्भव-करो विसर्गः) कर्म कहलाता है (8.3) जो स्वयं में एक और गूढ़ विषय है। नियत कर्म भी भ्रम काएक कारण है। इसका समाधान बताते हुए श्रीकृष्ण कर्म करते हुए आन्तरिक समत्व बनाए रखने का मार्ग प्रस्तुत करते हैं। वे हमें ज्ञान की तलवार से संशयों का छेदन करने (4.41) तथा अनासक्ति की कुल्हाड़ी से गहरी जड़ें जमा चुके आसक्तियों को काटने (15.3) का उपदेश देते हैं।गुणों के आधार पर कर्म, कर्ता और ज्ञान -इन तीनों के तीन-तीन प्रकार बताने के बाद, श्रीकृष्ण कर्म के विषय में विस्तार से कहते हैं कि “राग और द्वेष से रहित तथा फल की इच्छा के बिना किया गया नियत कर्म सात्विक कर्म कहलाता है (18.23)। जो कर्म इच्छाओं की पूर्ति की लालसा से प्रेरित होकर अथवा अहंकार के साथ और अत्यधिक परिश्रम से किया जाता है, उसे राजसिक कर्म कहा गया है (18.24)। जो कर्म मोहवश प्रारम्भ किया गया हो, जिसमें अपनी सामर्थ्य पर विचार न किया गया हो, और जिसके परिणाम, हानि या दूसरों को होने वाले कष्ट की कोई परवाह न की गई हो, वह तामसिक कर्म कहलाता है” (18.25)।श्रीकृष्ण कर्ता को भी तीन प्रकारों में विभाजित करते हुए कहते हैं “जोकर्ता आसक्ति और अहंकार से रहित हो, उत्साह और दृढ़ निश्चय सेयुक्त हो, तथा सिद्धि-असिद्धि (सफलता-असफलता) में समभाव रखता हो, वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है (18.26)। जो कर्ता कर्मफल की लालसा से प्रेरित होकर लोभी, हिंसक, अशुद्ध, तथा सुख-दुःख से प्रभावित रहता है, वह राजसिक कर्ता कहलाता है (18.27)। जो कर्ता अनुशासनहीन, अशिष्ट, हठी, कपटी, आलसी, उदास तथा कार्यों को टालने वाला है, वह तामसिक कर्ता कहलाता है” (18.28)।किसी भी समय जिस गुण का प्रभाव प्रमुख होता है, उसी के अनुसार कर्म और कर्ता -दोनों का स्वभाव भी बदल जाता है।

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