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by Shyambhai Thakar
श्यामभाई ठाकर, यह नाम आज श्रीमद्भागवत, रामकथा, श्रीमद्भगवद्गीता और हिंदू धर्मग्रंथों की हिंदू परंपरा के विद्वान, प्रामाणिक, मधुरभाषी प्रवक्ता के रूप में भारत और विदेशों में हिंदू समुदाय में जाना जाने लगा है। भारतीय संस्कृति से लहलहाते ध्वज के गौरव विस्तारक पूज्यभाईश्री रमेशभाई ओझाजी द्वारा भारत की सनातनी संस्कृति को समर्पित श्री बाबडेश्वर संस्कृत महाविद्यालय, सांदीपनि विद्यानिकेतन, पोरबंदर में संस्कृत व्याकरण में आचार्य (M.A) तक शिक्षाप्राप्त श्यामभाई, श्रीमद्भागवत आदि को केवल प्रवचनका ही विषय न मानते हुए अपनी सहज दिनचर्या के रूप में श्रीमद्भागवत, गीता, रामचरितमानस, महाभारत और हाल के लेखकों के श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन करते रहते है। उनकी सत्संग यात्रा, जो 1999 से जारी है, भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, अफ्रीकी देशों में 165 से अधिक कथाओं और ग्रंथों के शतावधि मूल पारायणोंके रूप में विस्तृत हुई है और फैलती जा रही है। पूज्यभाईश्री की आज्ञा और आशीर्वाद से, कथावाचन के साथ साथ श्यामभाई सांदीपनि में, आज के छात्रों और भविष्य के कथाकारों को मूल श्रीमद्भागवत ग्रंथ का 2011 से अध्ययन कराते हैं, जो कि आज
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श्यामभाई ठाकर, यह नाम आज श्रीमद्भागवत, रामकथा, श्रीमद्भगवद्गीता और हिंदू धर्मग्रंथों की हिंदू परंपरा के विद्वान, प्रामाणिक, मधुरभाषी प्रवक्ता के रूप में भारत और विदेशों में हिंदू समुदाय में जाना जाने लगा है। भारतीय संस्कृति से लहलहाते ध्वज के गौरव विस्तारक पूज्यभाईश्री रमेशभाई ओझाजी द्वारा भारत की सनातनी संस्कृति को समर्पित श्री बाबडेश्वर संस्कृत महाविद्यालय, सांदीपनि विद्यानिकेतन, पोरबंदर में संस्कृत व्याकरण में आचार्य (M.A) तक शिक्षाप्राप्त श्यामभाई, श्रीमद्भागवत आदि को केवल प्रवचनका ही विषय न मानते हुए अपनी सहज दिनचर्या के रूप में श्रीमद्भागवत, गीता, रामचरितमानस, महाभारत और हाल के लेखकों के श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन करते रहते है। उनकी सत्संग यात्रा, जो 1999 से जारी है, भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, अफ्रीकी देशों में 170 से अधिक कथाओं और ग्रंथों के शतावधि मूल पारायणोंके रूप में विस्तृत हुई है और फैलती जा रही है। पूज्यभाईश्री की आज्ञा और आशीर्वाद से, कथावाचन के साथ साथ श्यामभाई सांदीपनि में, आज के छात्रों और भविष्य के कथाकारों को मूल श्रीमद्भागवत ग्रंथ का 2011 से अध्ययन कराते हैं, जो कि आज के समय में दुर्लभ है उसके पावन फल स्वरूप आज कई विद्यार्थी श्रीमद्भागवत के गुरु परंपरा से पढ़े हुए कथाकारों के रूप में समाज की शास्त्र सेवा कर रहे हैं. साथ ही श्यामभाई वेद-शास्त्रों के विद्यार्थियों को निवास-भोजन-पुस्तक आदि की सहायता करते हैं।
श्यामभाई ठाकर, यह नाम आज श्रीमद्भागवत, रामकथा, श्रीमद्भगवद्गीता और हिंदू धर्मग्रंथों की हिंदू परंपरा के विद्वान, प्रामाणिक, मधुरभाषी प्रवक्ता के रूप में भारत और विदेशों में हिंदू समुदाय में जाना जाने लगा है। भारतीय संस्कृति से लहलहाते ध्वज के गौरव विस्तारक पूज्यभाईश्री रमेशभाई ओझाजी द्वारा भारत की सनातनी संस्कृति को समर्पित श्री बाबडेश्वर संस्कृत महाविद्यालय, सांदीपनि विद्यानिकेतन, पोरबंदर में संस्कृत व्याकरण में आचार्य (M.A) तक शिक्षाप्राप्त श्यामभाई, श्रीमद्भागवत आदि को केवल प्रवचनका ही विषय न मानते हुए अपनी सहज दिनचर्या के रूप में श्रीमद्भागवत, गीता, रामचरितमानस, महाभारत और हाल के लेखकों के श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन करते रहते है। उनकी सत्संग यात्रा, जो 1999 से जारी है, भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, अफ्रीकी देशों में 170 से अधिक कथाओं और ग्रंथों के शतावधि मूल पारायणोंके रूप में विस्तृत हुई है और फैलती जा रही है। पूज्यभाईश्री की आज्ञा और आशीर्वाद से, कथावाचन के साथ साथ श्यामभाई सांदीपनि में, आज के छात्रों और भविष्य के कथाकारों को मूल श्रीमद्भागवत ग्रंथ का 2011 से अध्ययन कराते हैं, जो कि आज के समय में दुर्लभ है उसके पावन फल स्वरूप आज कई विद्यार्थी श्रीमद्भागवत के गुरु परंपरा से पढ़े हुए कथाकारों के रूप में समाज की शास्त्र सेवा कर रहे हैं. साथ ही श्यामभाई वेद-शास्त्रों के विद्यार्थियों को निवास-भोजन-पुस्तक आदि की सहायता करते हैं।
श्यामभाई ठाकर, यह नाम आज श्रीमद्भागवत, रामकथा, श्रीमद्भगवद्गीता और हिंदू धर्मग्रंथों की हिंदू परंपरा के विद्वान, प्रामाणिक, मधुरभाषी प्रवक्ता के रूप में भारत और विदेशों में हिंदू समुदाय में जाना जाने लगा है। भारतीय संस्कृति से लहलहाते ध्वज के गौरव विस्तारक पूज्यभाईश्री रमेशभाई ओझाजी द्वारा भारत की सनातनी संस्कृति को समर्पित श्री बाबडेश्वर संस्कृत महाविद्यालय, सांदीपनि विद्यानिकेतन, पोरबंदर में संस्कृत व्याकरण में आचार्य (M.A) तक शिक्षाप्राप्त श्यामभाई, श्रीमद्भागवत आदि को केवल प्रवचनका ही विषय न मानते हुए अपनी सहज दिनचर्या के रूप में श्रीमद्भागवत, गीता, रामचरितमानस, महाभारत और हाल के लेखकों के श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन करते रहते है। उनकी सत्संग यात्रा, जो 1999 से जारी है, भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, अफ्रीकी देशों में 170 से अधिक कथाओं और ग्रंथों के शतावधि मूल पारायणोंके रूप में विस्तृत हुई है और फैलती जा रही है। पूज्यभाईश्री की आज्ञा और आशीर्वाद से, कथावाचन के साथ साथ श्यामभाई सांदीपनि में, आज के छात्रों और भविष्य के कथाकारों को मूल श्रीमद्भागवत ग्रंथ का 2011 से अध्ययन कराते हैं, जो कि आज के समय में दुर्लभ है उसके पावन फल स्वरूप आज कई विद्यार्थी श्रीमद्भागवत के गुरु परंपरा से पढ़े हुए कथाकारों के रूप में समाज की शास्त्र सेवा कर रहे हैं. साथ ही श्यामभाई वेद-शास्त्रों के विद्यार्थियों को निवास-भोजन-पुस्तक आदि की सहायता करते हैं।
श्यामभाई ठाकर, यह नाम आज श्रीमद्भागवत, रामकथा, श्रीमद्भगवद्गीता और हिंदू धर्मग्रंथों की हिंदू परंपरा के विद्वान, प्रामाणिक, मधुरभाषी प्रवक्ता के रूप में भारत और विदेशों में हिंदू समुदाय में जाना जाने लगा है। भारतीय संस्कृति से लहलहाते ध्वज के गौरव विस्तारक पूज्यभाईश्री रमेशभाई ओझाजी द्वारा भारत की सनातनी संस्कृति को समर्पित श्री बाबडेश्वर संस्कृत महाविद्यालय, सांदीपनि विद्यानिकेतन, पोरबंदर में संस्कृत व्याकरण में आचार्य (M.A) तक शिक्षाप्राप्त श्यामभाई, श्रीमद्भागवत आदि को केवल प्रवचनका ही विषय न मानते हुए अपनी सहज दिनचर्या के रूप में श्रीमद्भागवत, गीता, रामचरितमानस, महाभारत और हाल के लेखकों के श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन करते रहते है। उनकी सत्संग यात्रा, जो 1999 से जारी है, भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, अफ्रीकी देशों में 170 से अधिक कथाओं और ग्रंथों के शतावधि मूल पारायणोंके रूप में विस्तृत हुई है और फैलती जा रही है। पूज्यभाईश्री की आज्ञा और आशीर्वाद से, कथावाचन के साथ साथ श्यामभाई सांदीपनि में, आज के छात्रों और भविष्य के कथाकारों को मूल श्रीमद्भागवत ग्रंथ का 2011 से अध्ययन कराते हैं, जो कि आज के समय में दुर्लभ है उसके पावन फल स्वरूप आज कई विद्यार्थी श्रीमद्भागवत के गुरु परंपरा से पढ़े हुए कथाकारों के रूप में समाज की शास्त्र सेवा कर रहे हैं. साथ ही श्यामभाई वेद-शास्त्रों के विद्यार्थियों को निवास-भोजन-पुस्तक आदि की सहायता करते हैं।
श्यामभाई ठाकर, यह नाम आज श्रीमद्भागवत, रामकथा, श्रीमद्भगवद्गीता और हिंदू धर्मग्रंथों की हिंदू परंपरा के विद्वान, प्रामाणिक, मधुरभाषी प्रवक्ता के रूप में भारत और विदेशों में हिंदू समुदाय में जाना जाने लगा है। भारतीय संस्कृति से लहलहाते ध्वज के गौरव विस्तारक पूज्यभाईश्री रमेशभाई ओझाजी द्वारा भारत की सनातनी संस्कृति को समर्पित श्री बाबडेश्वर संस्कृत महाविद्यालय, सांदीपनि विद्यानिकेतन, पोरबंदर में संस्कृत व्याकरण में आचार्य (M.A) तक शिक्षाप्राप्त श्यामभाई, श्रीमद्भागवत आदि को केवल प्रवचनका ही विषय न मानते हुए अपनी सहज दिनचर्या के रूप में श्रीमद्भागवत, गीता, रामचरितमानस, महाभारत और हाल के लेखकों के श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन करते रहते है। उनकी सत्संग यात्रा, जो 1999 से जारी है, भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, अफ्रीकी देशों में 170 से अधिक कथाओं और ग्रंथों के शतावधि मूल पारायणोंके रूप में विस्तृत हुई है और फैलती जा रही है। पूज्यभाईश्री की आज्ञा और आशीर्वाद से, कथावाचन के साथ साथ श्यामभाई सांदीपनि में, आज के छात्रों और भविष्य के कथाकारों को मूल श्रीमद्भागवत ग्रंथ का 2011 से अध्ययन कराते हैं, जो कि आज के समय में दुर्लभ है उसके पावन फल स्वरूप आज कई विद्यार्थी श्रीमद्भागवत के गुरु परंपरा से पढ़े हुए कथाकारों के रूप में समाज की शास्त्र सेवा कर रहे हैं. साथ ही श्यामभाई वेद-शास्त्रों के विद्यार्थियों को निवास-भोजन-पुस्तक आदि की सहायता करते हैं।
श्यामभाई ठाकर, यह नाम आज श्रीमद्भागवत, रामकथा, श्रीमद्भगवद्गीता और हिंदू धर्मग्रंथों की हिंदू परंपरा के विद्वान, प्रामाणिक, मधुरभाषी प्रवक्ता के रूप में भारत और विदेशों में हिंदू समुदाय में जाना जाने लगा है। भारतीय संस्कृति से लहलहाते ध्वज के गौरव विस्तारक पूज्यभाईश्री रमेशभाई ओझाजी द्वारा भारत की सनातनी संस्कृति को समर्पित श्री बाबडेश्वर संस्कृत महाविद्यालय, सांदीपनि विद्यानिकेतन, पोरबंदर में संस्कृत व्याकरण में आचार्य (M.A) तक शिक्षाप्राप्त श्यामभाई, श्रीमद्भागवत आदि को केवल प्रवचनका ही विषय न मानते हुए अपनी सहज दिनचर्या के रूप में श्रीमद्भागवत, गीता, रामचरितमानस, महाभारत और हाल के लेखकों के श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन करते रहते है। उनकी सत्संग यात्रा, जो 1999 से जारी है, भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, अफ्रीकी देशों में 170 से अधिक कथाओं और ग्रंथों के शतावधि मूल पारायणोंके रूप में विस्तृत हुई है और फैलती जा रही है। पूज्यभाईश्री की आज्ञा और आशीर्वाद से, कथावाचन के साथ साथ श्यामभाई सांदीपनि में, आज के छात्रों और भविष्य के कथाकारों को मूल श्रीमद्भागवत ग्रंथ का 2011 से अध्ययन कराते हैं, जो कि आज के समय में दुर्लभ है उसके पावन फल स्वरूप आज कई विद्यार्थी श्रीमद्भागवत के गुरु परंपरा से पढ़े हुए कथाकारों के रूप में समाज की शास्त्र सेवा कर रहे हैं. साथ ही श्यामभाई वेद-शास्त्रों के विद्यार्थियों को निवास-भोजन-पुस्तक आदि की सहायता करते हैं।
Contact +91 9979362911 परम पावन भोग-मोक्षदायी श्रीमद्भागवत महापुराणके मूल पारायणमें आपका स्वागत है. श्रीमद्भगवत वेदरूप कल्पवृक्षका पका हुआ फल ही है. हम सनातनी इस संहिताका पठन-पाठन और सकाम और निष्काम पारायण करते-कराते रहते हैं. कुछ मूल पारायण यूट्यूबपर हैं, श्रीहरिगुरुकृपा और विशेषतः गुरुदेवकी आज्ञासे हम सब जनोंने भी मिलकर प्रयास किया है. वर्षोंके परिश्रमसे तैयार हुए इस दिव्य उपक्रमके हम सबको प्राप्त होनेमें भगवान श्रीहरि और सनातन धर्मकी ध्वजा लेकर पिछले ६ दशकोंसे विश्वमें विचरण कर रहे सद्गुरुदेव पूज्य भाईश्रीकी करुणा ही प्रमुख कारण है. जिसका मैं हमेशा कृतज्ञ हूँ ऐसे भारतके गौरवशाली गीताप्रेसकी पुस्तकोंके सहारे मैनें (श्यामभाई ठाकरने) स्वर सेवा की है. प्रायः पूरा पूरा ऑडियो रेकॉर्डिंग सान्दीपनिके स्टूडियोमें हुआ है. वहांपर केतनभाई मेहताका बिना घडीमें देखे समय देकर पूरा सहयोग रहा है. चेतनभाई शर्माने भी हमारी हमेशा मदद की है. इस अनुष्ठान में जितना मेरा भाव कि यह यथाशीघ्र सबको उपलब्ध हो, उतना ही मेरे मित्रवर्य हितेशभाई लाखाणी का भाव रहा है. आपने तकनिकी और भावसे भी समय निकालकर सर्वदा पूरा सहयोग किया है. मैं जिनको अधिकारसे समय-असमय भी कुछ करने के लिए कहूँ तो उत्साहसे कर देनेवाले हर्षितभाई शुक्लसे ही यह पाठ इस यथासंभव शुद्ध रूपमें प्रस्तुत है. पाठकी अशुद्धियाँ निकालना, मेरे साथ भाग-दौड़ करना, अंतमें जब विडिओ रूप दिया जा रहा था तो मूल श्लोकोंको तुषारभाईको उपलब्ध करानेकी भी महनीय सेवा आपके द्वारा ही हुई है. आपके साथ पाठकी शुद्धिका कार्य करनेमें सहयोग हेतु हार्दिकभाई पुरोहित, मयूरभाई जोशी, देवांगभाई भट्ट, ऋषिलभाई पाठक, दीक्षित जानी और अजयभाई जोशी आदिकी मूल्यवती सहायता मिली है. अशुद्धियाँ दूर करने हेतु निःस्वार्थ भाव और प्रेमसे उपयोग हेतु अपना सूरधारा स्टूडियो, भावनगर देनेवाले और एडिटिंगके साथ पूरे पाठके बैकग्राउंड म्यूजिकका भी संपादन कर देनेवाले हमारे माननीय इन्द्रजीतभाई राज्यगुरु और उनके पुत्र अंबरीषभाईके सर्वप्रकार सहयोगके लिए कृतज्ञ हूँ . इसी प्रकार राजुभाई भट्टने अपना स्टूडियो सामवेद म्यूज़िक्स उपयोग हेतु दिया और थोड़ी एडिटिंग वहां भी हुई है. वहाँ चिन्तनभाई लाठीगरा ने सहयोग किया. और बड़े महत्व का काम एडिटिंग और डिज़ाइनिंग होता है. उसके द्वारा पूरे पारायणको इस सुन्दर रूपमें परोसनेका काम बड़ी लगनसे तत्त्व वीडियो विज़नके तुषारभाई त्रिवेदीने किया है. अंतमें, भगवानकी वस्तु भगवानको ही समर्पित करते हैं! Jai Śrī Kṛṣṇa! A heartfelt welcome to this sacred recitation of the Śrīmad Bhāgavata Mahāpurāṇa. The Śrīmad Bhāgavata is likened to the fully ripened fruit of the sacred Vedic tree. For generations, followers of Sanātana Dharma have continued the tradition of reading, reciting, and arranging recitals of this revered scripture — both for material fulfilment and spiritual liberation. Although several recitations of the Śrīmad Bhāgavata are available on YouTube, this particular endeavour has been completed under the instruction and blessings of Pujya Gurudeva Bhaishri, and by the grace of Śrī Hari. It is through his compassion, inspiration, and decades of tireless service in spreading the teachings of Sanātana Dharma across the world that this work has found its foundation and completion. We also express our sincere gratitude to India’s pride, Gītā Press, whose publications were instrumental in completing this recital. The audio recording of this recital was carried out at Sāndīpanī Vidyāniketan Studios, with the devoted assistance of Ketanbhai Mehta, who dedicated his time and heartfelt efforts to this project. We would also like to acknowledge Chetanbhai Sharma, whose continual support have been throughout. From the very beginning, our aim was to ensure that this became an authentic and accessible recital. Sharing this same vision, I would like to thank my dear friend Hiteshbhai Lakhani, whose technical expertise and dedication were vital in bringing this to fruition. This project would not have been possible without Harshitbhai Shukla, ever eager to offer his support at any time. Thanks to his commitment, the recital has been presented in its purest form. From identifying refinements and assisting with research to sourcing the original verses (for Tusharbhai), his seva and devotion have been truly humbling. We also extend our heartfelt thanks to Hardikbhai Purohit, Mayurbhai Joshi, Devangbhai Bhatt, Rishilbhai Pathak, Dixitbhai Jani and Ajaybhai Joshi for reviewing the text and offering their invaluable support. To ensure all corrections were made, edits completed, and additional background music incorporated, we are deeply thankful to Respected Indrajitbhai Rajyaguru and his son Ambarishbhai of Surdhara Studios, who so kindly allowed us the use of their studio in Bhavnagar. Similarly, Rajubhai Bhatt opened his Samaveda Musics studio for us, where further editing was undertaken, with the support of Chintanbhai Lathigara. Our sincere appreciation also goes to Tusharbhai Trivedi from Tatva Video Vision, whose creativity and careful craftsmanship brought together every element of this project into the beautiful form you now see. Finally, we humbly offer that which belongs to the Lord — to the Lord Himself.
यामभाई ठाकर, यह नाम आज श्रीमद्भागवत, रामकथा, श्रीमद्भगवद्गीता और हिंदू धर्मग्रंथों की हिंदू परंपरा के विद्वान, प्रामाणिक, मधुरभाषी प्रवक्ता के रूप में भारत और विदेशों में हिंदू समुदाय में जाना जाने लगा है। भारतीय संस्कृति से लहलहाते ध्वज के गौरव विस्तारक पूज्यभाईश्री रमेशभाई ओझाजी द्वारा भारत की सनातनी संस्कृति को समर्पित श्री बाबडेश्वर संस्कृत महाविद्यालय, सांदीपनि विद्यानिकेतन, पोरबंदर में संस्कृत व्याकरण में आचार्य (M.A) तक शिक्षाप्राप्त श्यामभाई, श्रीमद्भागवत आदि को केवल प्रवचनका ही विषय न मानते हुए अपनी सहज दिनचर्या के रूप में श्रीमद्भागवत, गीता, रामचरितमानस, महाभारत और हाल के लेखकों के श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन करते रहते है। उनकी सत्संग यात्रा, जो 1999 से जारी है, भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, अफ्रीकी देशों में 170 से अधिक कथाओं और ग्रंथों के शतावधि मूल पारायणोंके रूप में विस्तृत हुई है और फैलती जा रही है। पूज्यभाईश्री की आज्ञा और आशीर्वाद से, कथावाचन के साथ साथ श्यामभाई सांदीपनि में, आज के छात्रों और भविष्य के कथाकारों को मूल श्रीमद्भागवत ग्रंथ का 2011 से अध्ययन कराते हैं, जो कि आज के समय में दुर्लभ है उसके पावन फल स्वरूप आज कई विद्यार्थी श्रीमद्भागवत के गुरु परंपरा से पढ़े हुए कथाकारों के रूप में समाज की शास्त्र सेवा कर रहे हैं. साथ ही श्यामभाई वेद-शास्त्रों के विद्यार्थियों को निवास-भोजन-पुस्तक आदि की सहायता करते हैं।
श्यामभाई ठाकर, यह नाम आज श्रीमद्भागवत, रामकथा, श्रीमद्भगवद्गीता और हिंदू धर्मग्रंथों की हिंदू परंपरा के विद्वान, प्रामाणिक, मधुरभाषी प्रवक्ता के रूप में भारत और विदेशों में हिंदू समुदाय में जाना जाने लगा है। भारतीय संस्कृति से लहलहाते ध्वज के गौरव विस्तारक पूज्यभाईश्री रमेशभाई ओझाजी द्वारा भारत की सनातनी संस्कृति को समर्पित श्री बाबडेश्वर संस्कृत महाविद्यालय, सांदीपनि विद्यानिकेतन, पोरबंदर में संस्कृत व्याकरण में आचार्य (M.A) तक शिक्षाप्राप्त श्यामभाई, श्रीमद्भागवत आदि को केवल प्रवचनका ही विषय न मानते हुए अपनी सहज दिनचर्या के रूप में श्रीमद्भागवत, गीता, रामचरितमानस, महाभारत और हाल के लेखकों के श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन करते रहते है। उनकी सत्संग यात्रा, जो 1999 से जारी है, भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, अफ्रीकी देशों में 165 से अधिक कथाओं और ग्रंथों के शतावधि मूल पारायणोंके रूप में विस्तृत हुई है और फैलती जा रही है। पूज्यभाईश्री की आज्ञा और आशीर्वाद से, कथावाचन के साथ साथ श्यामभाई सांदीपनि में, आज के छात्रों और भविष्य के कथाकारों को मूल श्रीमद्भागवत ग्रंथ का 2011 से अध्ययन कराते हैं, जो कि आज
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