Gita Acharan

223. बुराई का फल बुरा ही होता है

May 9, 2026·3 min
Episode Description from the Publisher

श्रीकृष्ण आसुरी प्रवृत्ति वालों का विस्तार से वर्णन करते हुए कहते हैं,"ऐसे अनेक प्रकार से भ्रमित मन वाले, मोह के जाल में उलझकर तथा विषय-भोगों में आसक्त होकर घोर नरक में गिरते हैं (16.16)। ऐसे अभिमानी और हठी लोग, संपत्ति के मद और अहंकार से मदमस्त होकर, शास्त्रों के विधि-विधानों का आदर न करते हुए पाखंडपूर्वक केवल नाम मात्र के लिए यज्ञ करते हैं (16.17)। अहंकार (मैं कर्ता हूँ), बल, दम्भ, कामना और क्रोध से अंधे होकर, ये द्वेषी पुरुष अपने भीतर तथा अन्य सभी प्राणियों में निवास करने वाले मुझ अन्तर्यामी को तुच्छ समझते हैं (16.18)। इन द्वेष करनेवाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में डालता हूँ (16.19)। ये अज्ञानी आत्माएँ आसुरी योनियों में बार-बार जन्म लेती हैं। हे अर्जुन, वे मूढ़ मुझे प्राप्त न कर पाने पर, धीरे-धीरे आसुरी योनियों को और उससे भी अति अधम गति को ही प्राप्त होते हैं" (16.20)।श्रीकृष्ण ने पहले कहा था कि वे सभी जीवों के प्रति समान भाव रखते हैं। उनके लिए न तो कोई द्वेष्य है और न ही कोई प्रिय है (9.29)। लेकिन उपरोक्त श्लोक संकेत करते हैं कि वे आसुरी प्रवृत्ति वालों से घृणा करते हैं और इसलिए उन्हें अधम योनियों में रखते हैं।यह प्रत्यक्ष विरोधाभास हमारे इस भ्रम से उत्पन्न होता है कि श्रीकृष्ण (परमात्माका नाम व्यक्ति की आस्था के आधार पर भिन्न हो सकता है) एक व्यक्ति हैं, जबकि वे वास्तव में स्वयं अस्तित्व हैं। वे केवल उन नियमों कावर्णन कर रहे हैं जो अस्तित्व को संचालित करते हैं। यह गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह है जहाँ ऊँचाई से कूदने पर गिरना अनिवार्य है। श्रीकृष्ण ने पहले इसका वर्णन इस प्रकार किया था, "व्यक्ति जिस भी प्रकार से मुझे भजते हैं, मैं उसी प्रकार से उन्हें प्राप्त होता हूँ" (4.11)। जब कोई आसुरी मार्ग अपनाता है, तो सम्भवतः समय के साथ, अस्तित्व स्वतः ही आसुरी ढंग से प्रतिक्रिया करता है।हमारा भौतिक शरीर विकास, उत्कृष्ट शिल्पकला और सुसंगति के संदर्भ में अस्तित्व की अनन्त उदारता का सर्वोत्तम उदाहरण है। यह हमें जो कुछ भी दिया गया है, उसके लिए कृतज्ञ होने के बारे में है, न कि इंद्रिय तृप्ति के लिए अस्तित्व से कुछ हड़पने के लिए।

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